सफेद कोट में फरिश्ते — जिनकी धड़कनों में बसती है मानवता!" : ऐसे फरिश्तों को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित की उठी मांग
Abid Hussain
Tue, Nov 11, 2025
चंपावत। चिकित्सा पेशा जहाँ आजकल “फीस” से मापा जाता है, वहीं कुछ लोग हैं जो “फीलिंग्स” से इलाज करते हैं — ऐसे ही हैं रेडियोलॉजिस्ट डॉ. ललित मोहन रखोलिया और उनकी जीवनसंगिनी बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. ऋतु रखोलिया। लोग कहते हैं, “भगवान सबको नहीं मिलते, इसलिए डॉक्टर बना दिए” — और अगर जीवित भगवान देखना हो तो रखोलिया दंपति से बेहतर मिसाल शायद ही कोई हो।सेवा का सिलसिला, समर्पण का दस्तूर डॉ. ललित, जो वर्तमान में संयुक्त निदेशक के पद पर हैं, वर्षों से बीमारों के लिए सिर्फ डॉक्टर नहीं, दर्द का दरिया बने हुए हैं।वहीं डॉ. ऋतु रखोलिया — हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर, जिन्होंने बच्चों को जिंदगी और माताओं को उम्मीद दी। उनके क्लिनिक से निकलते हैं नन्हे मुस्कुराते चहरे, और हर मां कहती है — “भगवान नहीं, ऋतु जी हैं!”
जब दुनिया मास्क के पीछे छिपी थी, ये दंपति आगे निकले थे
कोरोना काल में जब लोग "घर पर ही सुरक्षित" का नारा दे रहे थे, तब रखोलिया दंपति ने “हमें घर नहीं, अस्पताल चाहिए” कहकर मानवता की मिसाल कायम की।
इनका मानना था —
> “मरीजों को भाग्य के भरोसे छोड़ना कायरता है,
उनकी दुवाओं में ही हमारी ताकत की सरकारता है।”
सम्मान की झड़ी — लेकिन असली इनाम जनता का प्यार
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तक, जिलाधिकारी सुरेंद्र नारायण पांडे से लेकर नगर पालिका अध्यक्ष गोविंद वर्मा तक — सभी ने इस दंपति की सेवा भावना को सलाम किया।
लोगों की जुबान पर एक ही बात —
> “ऐसे डॉक्टरों को मिलना चाहिए राष्ट्रपति पुरस्कार,
क्योंकि इन्होंने सफेद कोट को दिया है इंसानियत का आकार।”
और आखिर में, चंपावत की गलियों से उठी एक शायरी...
> “किसी ने पूछा — फरिश्ते कैसे दिखते हैं,
किसी ने कहा — रखोलिया जैसे दिखते हैं।
इलाज नहीं, एहसास देते हैं,
जिंदगी को नई साँस देते हैं।”
वाकई, डॉ. ललित मोहन रखोलिया और डॉ. ऋतु रखोलिया — वो सच्चे हीरो हैं,
जो न हेडलाइन बनाते हैं, न लाइमलाइट चाहते हैं,
बस हर धड़कन में “सेवा” और हर मुस्कान में “ईश्वर” ढूंढते हैं।
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दमदार मिसाल